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    Home»उत्तराखंड»निजी कंपनियों ने बढ़ाए पेट्रोल-डीजल के दाम, सरकारी रहीं स्थिर—जानिए पूरा कारण
    उत्तराखंड नई दिल्ली राष्ट्रीय

    निजी कंपनियों ने बढ़ाए पेट्रोल-डीजल के दाम, सरकारी रहीं स्थिर—जानिए पूरा कारण

    Aarogya GangaBy Aarogya GangaMarch 27, 2026Updated:March 27, 2026No Comments3 Mins Read
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    सरकारी कंपनियों ने कीमतें स्थिर रखीं, लेकिन निजी कंपनियां बढ़ी लागत और बिना सब्सिडी के कारण दाम बढ़ाने को मजबूर
    देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। निजी तेल कंपनी Nayara Energy ने पेट्रोल के दाम में 5 रुपये प्रति लीटर और डीजल में 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर दी है, जबकि सरकारी तेल कंपनियों ने अभी तक अपने दामों में कोई बदलाव नहीं किया है। ऐसे में आम लोगों के मन में सवाल उठ रहा है कि आखिर निजी कंपनियां अलग से कीमतें कैसे तय करती हैं।
    दरअसल, भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें ‘डीरेगुलेटेड’ यानी सरकारी नियंत्रण से बाहर मानी जाती हैं, लेकिन व्यवहार में सरकार का प्रभाव अब भी बना रहता है। सरकारी कंपनियां जैसे Indian Oil Corporation, Bharat Petroleum और Hindustan Petroleum कई बार महंगाई को नियंत्रित रखने के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ने के बावजूद खुद कीमतें नहीं बढ़ातीं। इस दौरान होने वाले घाटे की भरपाई सरकार करती है।
    इसके उलट निजी कंपनियों को किसी तरह की सब्सिडी या वित्तीय मदद नहीं मिलती। यही वजह है कि जब कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं, तो उन्हें अपने घाटे से बचने के लिए खुद ही कीमतें बढ़ानी पड़ती हैं या अपने संचालन को सीमित करना पड़ता है।
    इंपोर्ट पैरिटी प्राइस (IPP) का असर
    निजी कंपनियां अपनी कीमतों का निर्धारण मुख्य रूप से ‘इंपोर्ट पैरिटी प्राइस’ (IPP) के आधार पर करती हैं। इसका मतलब है कि अगर वही तेल विदेश से आयात किया जाए, तो उसकी कुल लागत कितनी होगी। इसमें अंतरराष्ट्रीय बाजार का भाव, समुद्री भाड़ा, बीमा और पोर्ट चार्ज शामिल होते हैं। चूंकि निजी कंपनियां सीधे वैश्विक बाजार से जुड़ी होती हैं, इसलिए उनकी लागत ज्यादा संवेदनशील होती है।
    टैक्स और बेस प्राइस का गणित
    पेट्रोल-डीजल की कीमत में केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी और राज्य सरकारों का वैट (VAT) समान रूप से लागू होता है—चाहे कंपनी सरकारी हो या निजी। लेकिन निजी कंपनियों की बेस कॉस्ट अधिक होने और डीलरों को प्रतिस्पर्धी कमीशन देने की वजह से अंतिम कीमत बढ़ जाती है।
    अंडर-रिकवरी का खेल
    जब वैश्विक बाजार में कच्चा तेल महंगा होता है और सरकारी कंपनियां राजनीतिक या आर्थिक कारणों से कीमतें स्थिर रखती हैं, तो इसे ‘अंडर-रिकवरी’ की स्थिति कहा जाता है। इस दौरान निजी कंपनियों के लिए बिना सब्सिडी के उसी कीमत पर तेल बेचना मुश्किल हो जाता है, इसलिए वे दाम बढ़ाने का फैसला करती हैं।
    निजी कंपनियों की चुनौती
    भारत में Reliance Industries (Jio-bp), Nayara Energy और Shell जैसी कंपनियां पेट्रोल-डीजल का वितरण करती हैं। इन कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि उन्हें सरकारी कंपनियों जैसा संरक्षण नहीं मिलता, जबकि बाजार में प्रतिस्पर्धा बनाए रखना भी जरूरी होता है।
    ऐसे में जब भी निजी पेट्रोल पंपों पर तेल महंगा दिखाई देता है, तो इसके पीछे सिर्फ मुनाफा नहीं बल्कि लागत, टैक्स ढांचा और सरकारी-निजी नीतियों का फर्क जिम्मेदार होता है। यही कारण है कि आम उपभोक्ताओं को अलग-अलग पंपों पर अलग कीमतें देखने को मिलती हैं।

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